​…… तो क्यों जाएं बैंक ? 

सरकार देश को कैशलेस करना चाहती है ताकि भ्रष्टाचार पर रोक लगे। टैक्स चोरी रुके। केंद्र सरकार ने नोटबंदी की तो इसका मूल उद्देश्य भी कालाधन रोकना ही था। देश के करोड़ों लोगों ने नोटबंदी के बाद तमाम परेशानियां झेलकर भी सरकार का साथ दिया ताकि सरकार की मंशा पूरी हो। आठ नवम्बर16 के बाद एटीएम का चलन भी बढ़ा। अनपढ़ भी एटीएम का उपयोग करने लगे। लगने लगा कि देश कैशलेस व्यवस्था की तरफ तेजी से बढ़ रहा है। लेकिन धीरे-धीरे बैंकों ने अनेक शुल्क लगाने शुरू कर दिए।
शायद ये सोचकर, उपभोक्ता को कहां इतनी फुर्सत कि वो इन पर ध्यान दे। अनेक पुराने शुल्क शुरू करने के साथ नए-नए शुल्क लगाकर उपभोक्ताओं की जेब काटने की तैयारी कर ली। सरकार कहती है कि बैंकों में भीड़ बढ़ाने की जगह एटीएम का उपयोग करो। एटीएम से एक महीने में पांच बार पैसा निकालने की छूट है। अगर एटीएम में पैसा ना हो अथवा पैसे निकालने में तकनीकी खराबी आ जाए तो इसका खमियाजा उपभोक्ता को ही भुगतना होगा।
बैंक की गलती से अगर पांच बार पैसा नहीं निकला तो उपभोक्ता के एटीएम से पैसा निकालने के अवसर खत्म। अगली बार पैसा निकालेगा तो शुल्क भरना पड़ेगा। डेबिट-क्रेडिट कार्ड की सालाना फीस शुरू हो गई तो लॉकर का शुल्क भी 30 फीसदी तक बढ़ा दिया गया है।
उपभोक्ता को किए जाने वाले एसएमएस का शुल्क भी उसे ही भरना होगा। खातों में न्यूनतम एक हजार की सीमा बढ़ाकर शहरों में तीन हजार व मेट्रो सिटी में पांच हजार रुपए कर दिया गया। इसे बैंकों की खुली लूट के अलावा और क्या माना जाए? इस न्यूनतम जमा पर बैंक कितना मुनाफा वसूलेंगे? बैंक आखिर बने तो जनता की भलाई के लिए ही हैं। बैंक गुपचुप में शुल्क लगाकर जनता को लूटने लगें तो इस पर नजर रखने वाला कौन है?

यही कारण है, उपभोक्ता एटीएम जाने से कतराने लगे हैं। सरकार को बैंकों की कार्यप्रणाली पर नजर रखने के लिए नियामक बोर्ड को और सख्त बनाना चाहिए। बोर्ड की मंजूरी के बिना बैंक ऐसे कोई भी शुल्क ना लें। पैसा जमा कराने अथवा निकालने के लिए बार-बार शुल्क देना पड़े तो उपभोक्ता बैंक में पैसा रखेगा ही क्यों? सरकार अगर टैक्स चोरी और भ्रष्टाचार समाप्त करना चाहती है तो उसे बैंक उपभोक्ताओं को लुटने से बचाना होगा। तभी उसकी मुहिम आगे बढ़ पाएगी।

सौजन्य – पत्रिका।

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