​किसका नया भारत चाहिए, गांधी या भागवत का?

राजदीप सरदेसाई

गोवा में कई चीजों का लुत्फ उठाया जा सकता है लेकिन, स्वाद की विविधता इस छोटे से राज्य का सबसे बड़ा आकर्षण है। जिस दिन आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत गोवध के खिलाफ राष्ट्रीय कानून बनाने का आह्वान कर रहे थे, मैं गोवा में एक मंत्री के साथ डिनर ले रहा था : मेनू में था पॉर्क सॉर्पोटेल (पुर्तगाली मूल का मांसाहारी व्यंजन) और बीफ चिली फ्राय। मैंने मंत्री महोदय से पूछा कि वे भागवत के आह्वान को किस रूप में लेते हैं। उन्होंने सौम्य मुस्कान के साथ कहा,‘भागवतजी नागपुर में रहते हैं, हम गोवा में। एक भारत, कई आहार, अब डिनर का लुत्फ उठाएं!’ यदि हैदराबाद के सांसद ओवैसी की वायरल हो चुकी टिप्पणी के मुताबिक यह ‘यमी-ममी’ बीफ पॉलिटिक्स का उदाहरण है।
सच यह है कि गोवा में भाजपा अपने राष्ट्रीय अवतार से बिल्कुल अलग पार्टी है खासतौर पर उत्तर भारतीय स्वरूप से, जहां संघ परिवार से जुड़े गोरक्षक समूह बांटने वाली और कई बार हिंसक किस्म की ‘गो-राजनीति’ को आगे बढ़ाने में लगे हैं, जिसका उद्देश्य अल्पसंख्यक समूहों को आतंकित करना है। मनोहर पर्रिकर और उनके साथी मुख्यमंत्री हरियाणा के मनोहरलाल खट्‌टर के बीच उतनी समानता नहीं होगी, जितनी पर्रिकर की गोवा के अपने विरोधियों से होगी। गोवा में भाजपा के 13 विधायकों में सात कैथोलिक हैं। वहां ऐसी सरकार है, जो पिछले दरवाजे से छोटे दलों व निर्दलियों का समर्थन लेने के बाद सत्ता में आई है। यदि स्थानीय भाजपा अल्पसंख्यक कैथोलिक समुदाय से रिश्ता नहीं बनाती तो उसका वजूद सिमटकर रह जाता।
तथ्य तो यह है कि कैथोलिक समुदाय से दूरी मिटाने के प्रयासों के कारण ही पर्रिकर 2012 में भाजपा की पहली बहुमत वाली सरकार बना सकें। गोवा एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां आंशिक रूप से ही सही, भाजपा अपनी हिंदू बहुसंख्यकों की पार्टी होने की छवि तोड़ सकी है। यह भी सही है कि कैथोलिकों को साथ में लेने के अलावा भाजपा के पास गोवा में कोई विकल्प नहीं है। राज्य की आबादी में 22 फीसदी होने के कारण गोवा के कैथोलिक इतने बड़े व प्रभावशाली समूदाय हैं कि उनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। भाजपा देश की सबसे बड़ी आबादी वाले प्रदेश में एक भी मुस्लिम को सीट दिए बिना काम चला सकती है लेकिन, वह गोवा में ऐसा जोखिम नहीं ले सकती। उत्तर प्रदेश में भाजपा हिंदुत्ववादी मतदातावर्ग पर ध्यान केंद्रित कर 18 फीसदी मुस्लिम आबादी को अलग-थलग करने या हाशिये पर डालने की कोशिश कर सकती है लेकिन, गोवा में हिंदू-कैथोलिक परस्पर निर्भरता की जड़ें इतनी गहरी हैं कि उसे किसी एक समुदाय की विचारधारा में बहाया नहीं जा सकता। हरियाणा में भाजपा गोमांस बिक्री और उसके खाने के खिलाफ कड़ा कानून ला सकती है लेकिन, गोवा में वह ऐसा नहीं कर सकती, क्योंकि वोट बैंक का आबादीगत चरित्र ऐसे किसी थोपे गए कानून के खिलाफ है। इससे मैं अपने मूल विषय पर आता हूं : भाजपा जब भौगोलिक रूप से विस्तार करके सच्चे अर्थों में अखिल भारतीय पार्टी होने का प्रयास कर रही है तो उसका सामना अपने हिंदुत्ववाद से होगा। पूर्वोत्तर खासतौर पर अरुणाचल, नगालैंड, मेघालय और मिजोरम जैसे राज्यों में पार्टी राम मंदिर या गोवध जैसे केंद्रीय मुद्‌दों के आधार पर पैठ नहीं बना सकती। यहां पार्टी ने संघीय सत्ता की साझेधारी की उदार व्यवस्था निर्मित करने का प्रयास किया है, जिसमें केंद्र व राज्य परस्पर फायदे की गठबंधन व्यवस्था में संसाधनों के साझेदार बनते हैं। किसी भी कीमत पर सत्ता हासिल करने के सिवाय मणिपुर और अरुणाचल की भाजपा को दिल्ली की मोदी सरकार से जोड़ने वाला कोई वैचारिक लगाव नहीं है।

इसी तरह की विसंगति विंध्याचल के पार दक्षिण के केरल और तमिलुनाडु जैसे राज्यों में पैर जमाने के भाजपा के प्रयासों में भी देखी जा सकती है। केरल में स्थानीय भाजपा ने एक स्वर से गोमांस को लेकर पार्टी के परम्परागत दृष्टिकोण से खुद को दूर कर लिया है। पार्टी पहले ही अपने पूर्व सांसद व आरएसएस विचारक तरुण विजय के काली त्वचा को लेकर दिए बयान से शर्मिंदा है। यह इस बात का क्लासिक उदाहरण है कि कैसे ‘हिंदू-हिंदी-हिंदुस्तानी’ की उत्तर भारतीय मानसिकता द्राविडी पहचान को आसानी से गले नहीं लगा पा रही है। नैतिक और बौद्धिक रूप से दिवालिया हो चुका विपक्ष नहीं, बल्कि भारत की विविधता ही पूरे देश पर एक जैसी धार्मिक-सांस्कृतिक समानता छोपने के प्रयासों में सबसे बड़ी चुनौती है। आरएसएस चाहे 2019 में संसद में दो-तिहाई बहुमत पाने पर जोर देकर हिंदू राष्ट्र की कल्पना कर रहा हो पर संघ परिवार की राजनीतिक शाखा के रूप में भाजपा को देश के गणतांत्रिक संविधान के साथ ऐसा कुछ करना भारी पड़ेगा। यह अकारण ही नहीं है कि प्रधानमंत्री मोदी ने खुद गो-रक्षक राजनीति से दूर रहने की कोशिश की है। उन्हें अहसास है कि इससे उनकी सबको साथ लेकर चलने वाले नेता की सप्रयास बनाई गई छवि नष्ट हो सकती है। यहां यह जोर देना होगा कि आंबेडकर वादी संवैधानिक विज़न ऐसे व्यक्तिगत अधिकारों व स्वतंत्रताओं के आसपास घूमता है, जो भारत के बहुत सारी पहचानों की भूमि होने की धारणा पर आधारित हैं। यही विज़न था, जिसके कारण गो-संरक्षण नीति-निर्देशक सिद्धांतों में रखा गया न कि संवैधानिक गारंटी प्राप्त मूल अधिकारों में। गहन चर्चा व बहस के बाद संविधान सभा इस सहमति पर पहुंची कि लाखों हिंदुओं के लिए गाय एक पवित्र पशु है लेकिन, फिर भी भारत को ‘केवल हिंदुओं’ के राष्ट्र के रूप में नहीं देखा जा सकता। जून 1947 में दिए गए एक भाषण में महात्मा गांधी ने इस भावना का इजहार किया था, जब उन्होंने कहा, ‘मैं किसी को गोवध न करने के लिए कैसे मजबूर कर सकता हूं, जब तक कि वह खुद ऐसा न चाहे? ऐसा नहीं है कि भारतीय संघ में केवल हिंदू ही रहते हैं, मुस्लिम, पारसी, ईसाई और अन्य धार्मिक समूह भी तो हैं।’ उसके सत्तर साल बाद भारत को फिर महात्मा और आरएसएस सरसंघचालक के ‘नए’ भारत के विज़न के बीच चुनाव करना है।
पुनश्च :गोवा में बीफ चिली की पूरी प्लेट हजम करने के एक दिन बाद, मैं पड़ोसी महाराष्ट्र में गया, जहां भाजपा का ही शासन है। वहां गोमांस पाए जाने या बेचने के अारोप में मुझ पर 10 हजार रुपए का जुर्माना और पांच साल जेल की सजा सुनाई जा सकती है। क्या इससे बेतुकी और घोर पाखंडपूर्ण बात कोई और हो सकती है?

(ये लेखक के अपने विचार हैं।)

राजदीप सरदेसाई

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक

rajdeepsardesai52@gmail.com
सौजन्य – दैनिक भास्कर।

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