सोंच…

उदयमोहन पाठक 

सोंचता हूं कि अपनी सोंच बदल डालूँँ, पर सोंच तो सोंच है सोंचने को बाध्य करेगा। यही सोंच कर जिंदा हूं कि मुझमें भविष्य की सोंच है। पर कोई यह सोंचता नहीं कि लोग क्या सोंचते हैं। यही सोंच सोंच कर मैं पागल हूं कि मैं सोंचता क्यों हूं? मैं सोंचता हूं इसलिए अच्छी सोंच के बारे में कहता हूं। अच्छी सोंच इंसान को बदल देता है इसीलिए तब तक सोंचते रहो जब तक तेरी सोंच ना बदल जाये।

Advertisements