औकात दस पैसे की


व्यंग्य राही की कलम से

अब तक हम अपनी औकात दो फूटी कौड़ी से ज्यादा नहीं आंक पाते थे। आजकल हमारी जानकारियों का बाजार जरा ऊंचा चल रहा है। अब हम ‘कौडिय़ों’ की बजाय दस से बीस पैसों में बिक रहे हैं। बस इसी बात से पिछले दो दिनों से हमारे प्रसन्नता सूचकांक यानी ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ में तकरीबन दो सौ फीसदी का इजाफा हुआ है। ऐसा करिश्मा पांच साल में एकाध बार हो जाता है। विशेषकर चुनावों के दिनों में अचानक हमारे ‘बाजार भाव’ बढ़ जाते हैं।
चुनावों के बाद हम अपने और अपने ‘भावों’ को औंधे मुंह पड़ा पाते हैं। लगता है कोई हमारे ऊपर चढ़ कर उछलकूद कर रहा हो। हम उस आंकड़ा चोर के शुक्रगुजार हैं जिसने हमारे बैंक डाटा को दस पैसे में बेच दिया। आप जीवन सम्बंधी सूचनाओं को लाखों रुपए की समझें लेकिन हमने तो उनका मूल्य दो-चार टके से ज्यादा कभी समझा ही नहीं था। समझते भी कैसे। सारी जिन्दगी दो रोटी और चार घूंट की जुगाड़ में ही गुजर गई।
इस देश में या तो नेताओं की कीमत है या ऊंचे अफसरों की, बाकी तो हमारे सरीखे करोड़ों कीड़े-मकोड़े हैं जो पैदा होते हैं। पढ़ते-लिखते हैं। नौकरी करते हैं। ब्याह-शादी करके बच्चे पैदा करते हैं, रिटायर होते हैं और एक दिन परलोकगामी हो जाते हैं। खैर, यह तो हरेक की जिन्दगी के राणे किस्से हैं।
बहरहाल अपने जीवन की सारी सूचनाओं को दस पैसे में बिक जाने पर हमें कोई खतरा इसलिए भी नहीं कि कोई हमें लूटना चाहेगा तो उसे मिलेगा क्या? हमारा माल लूटने के चक्कर में लुटेरे अपने घंटे खराब ही करेगा। हमारे खातों में कभी छोटी बचत के सिवाय कुछ रहा ही नहीं।
हां उन मोटे कर्जों का रिकार्ड जरूर है जो हम गाहे-ब-गाहे बैंकों से उठाते रहे हैं। हम तो सरकार को धन्यवाद देते हैं जिसकी लापरवाही की वजह से हमें अपनी औकात तो पता चली। अब मुर्गे की मानिन्द गर्दन फुला कर कह तो सकते हैं – सुन लो दुनिया वालों! हम भी औकात वाले हैं।
सौजन्य – पत्रिका।

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