र्सावजनिक लोक उपक्रम दिवस 

लखन लाल मिश्रा
१० अप्रेल से १६ अप्रेल एक सप्ताह र्सावजनिक लोक उपक्रम दिवस पर हम कुछ रचना, भाषण मनाकर इतिश्री कर लेते हैं। राष्ट्रहित में सार्वजनिक लोक उपक्रम समाजिक दायित्व का भी निर्वहन कर रहे होते हैं, किंतु हमने कभी यह सोचा है कि 1991 के बाद कितने लोक उपक्रम को निजीकरण की ओर अग्रसित कर दिया या बीमार बता कर बंद करने का प्रयास किया गया। विलय के नाम पर लाखों पदाधिकारी, कर्मचारी एवं कामगारो की सेवा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के माध्यम से विस्थापित कर दिया गया। 

जिन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ग्रहन नहीं किया उन्हें आज भी 1987 के वेतन पर निर्वहन कर रहे हैं।महरत्न, नवरत्न,मिनी रत्न के नाम पर लोक उपक्रम चल रहे हैं ।सी एस आर के तहत करोड़ों रूपए व्यय किए जा रहे हैं ।अस्थाई ठेका के मजदूरों को  समान वेतन पर नियुक्ति की जा रही है परंतुMerging कम्पनी के employeesलिए  कोई नीति नहीं है जब कि सभी पदाधिकारी कर्मचारी एव कामगार एक ही संस्था में काम कर रहे हैं। जब देश के लाखों अस्थायी कर्मचारियों को राहत प्रदान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला दिया है कि सभी अस्थायी कर्मचारियों को स्थायी कर्मचारियों के बराबर वेतन मिलना चाहिए। यानी अदालत के मुताबिक अस्थायी कामगार भी स्थयी की तरह मेहनताना पाने के हकदार हैं।

जस्टिस जे.एस. खेहड़ और न्यायमूर्ति एसए बोबडे की पीठ ने कहा कि ‘समान कार्य के लिए समान वेतन’ की परिकल्पना संविधान के विभिन्न प्रावधानों को परीक्षण कर के बाद आई है। अगर कोई कर्मचारी दूसरे कर्मचारियों के समान काम या जिम्मेदारी निभाता है, तो उसके दूसरे कर्मचारियों से कम मेहनताना नहीं दिया जा सकता।

समान काम के लिए समान वेतन के तहत हर कर्मचारी को ये अधिकार है कि वो नियमित कर्मचारी के बराबर वेतन पाए। अदालत का कहना था कि, हमारी राय में कृत्रिम प्रतिमानों के आधार पर किसी की मेहनत का फल न देना गलत है। समान काम करने वाले कर्मचारी को कम वेतन नहीं बढ़या जा सकता। ऐसी हरकत ने केवल अपमानजनक है, बल्कि मानवीय गरिमा पर कुठाराघात है।

जाहिर है अदालत ने अपने फैसले में जो कुछ भी कहा है, वह सही भी है। अदालत के इस फैसले से देश भर में अनुबंध पर काम कर रहे उन लाखों कर्मचारियों को लाभ होगा, जिन्हें समान योग्यता होने के बावजूद अपने सहकर्मियों के समान वेतन नहीं मिलता।

सर्वोच्च न्यायालय पंजाब के अस्थाई कर्मचारियों से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रहा था, जिसमें इन कर्मचारियों ने स्थाई कर्मचारियों के बराबर वेतन पाने के लिए अदालत का रूख किया था। इससे पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट नियमित कर्मचारियों के बराबर वेतन दिए जाने की उनकी याचिका ठुकरा चुका था। हाईकोर्ट से निराशा मिलने के बाद इन अस्थायी कर्मचारियों ने सुप्रीम कोर्ट ने अपनी गुहार लगाई। बहरहाल, सर्वोच्च न्यायालय ने हाईकोर्ट का आदेश पलट दिया और अपना अंतिम फैसला सुनाते हुए कहा कि देश में समान काम के लिए समान वेतन के सिद्धांत पर जरूर अमल होना चाहिए। क्योंकि भारत सरकार ने ‘इंटरनेशनल कंवेंशन ऑन इकोनॉमिक, सोशल एंड कल्चरल राइट्स 1966’ पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें समान कार्य के लिए समान वेतन देने की बात कही गई है।

पीठ का कहना था, कि कोई भी अपनी मर्जी से कम वेतन पर काम नहीं करता। वो अपने सम्मान और गरिमा की कीमत पर अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए इसे स्वीकार करता है। क्योंकि उसे पता होता है कि अगर वो कम वेतन पर काम नहीं करेगा, तो उस पर आश्रित इससे बहुत पीड़ित होंगे।

इससे अस्वैच्छिक दासता थोपी जाती है। अदालत ने यह स्पष्ट कर दिया कि समान काम के लिए समान वेतन का फैसला सभी तरह के अस्थायी कर्मचारियों पर लागू होता है। यानी सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला देश में सभी पर बाध्यकारी होगा।

देश में फिलहाल सार्वजनिक क्षेत्र में 50 फीसदी और निजी क्षेत्र में 70 फीसदी कर्मचारी ऐसे हैं, जो संविदा पर काम करते हैं। जहां तक केंद्र के सरकारी महकमों का सवाल है, तो ‘इंडियन स्टफिंग फेडरेशन’ की रिपोर्ट के मुताबिक केंद्रीय महकमों में 1 करोड़ 25 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं, जिनमें 69 लाख कर्मचारी ठेके या संविदा पर कार्यरत हैं। इन ठेका मजदूरों या संविदाकर्मियों की हालत बेहद खराब है। कई मर्तबा इन्हें न्यूनतक मजदूरी तक नहीं मिलती। इनके हितों के लिए बने श्रम कानूनों के लिए भी इन्हें किसी तरह का फायदा नहीं मिलता।

जबकि ‘ठेका मजदूर (विनियमन एवं उन्मूलन) अधिनियम- 1970’ की धारा 25 (5) (अ) के मुताबिक यदि कोई मजदूर ठेकेदार द्वारा नियोजित है, पर वह प्रधान नियोजक द्वारा नियोजित श्रमिक के समान ही काम करता है तो उसे वतेन, छुट्टी, कार्यावधि वहीं प्राप्त होगी जो प्रधान नियोजक के द्वारा नियोजित श्रमिक को मिलती है।

इस कानून को संसद में छियालिस साल पहले पारित किया गया था, लेकिन आज भी यह कानून देश में सही तरह से लागू नहीं हैं।

‘समान काम समान वेतन’ और ‘स्थाई काम, स्थाई भर्ती’ सिद्धांत लागू करने की मांग लगातार अनसुनी की जाती रही हैं । जबकि समान काम के लिए समान वेतन की व्यवसथा हमारे संविधान के अनुच्छेद 14 में ही निहित है।

कमोबेश यही बात संविधान के अनुच्देद 39 (घ) में कही गई है। यही नहीं समान वेतन अधिनियम 1976 में भी यह साफ प्रावधान है कि एक ही तरीके के काम के लिए समान वेतन मिलना चाहिए। बावजूद इसके इन कानूनों की हर ओर अवहेलना की जाती रही है। किसी भी पार्टी की कोई भी सरकार रही हो ‘समान काम के लिए समान वेतन’ के सिद्धांत को उसने बिल्कुल भी नहीं माना।

ज्यादातर राज्यों मे अलग-अलग नामों से बड़ी तादाद में कर्मचारी और मजदूर संविदा के आधार पर नौकरी में है । जब भी चुनाव का मौका आता है, तो हर राजनीतिक पार्टी इन कर्मचारियों से वादा करती हैं कि वे सत्ता में आई, तो इन कर्मचारियों को नियमित कर देंगी और उन्हें समान वेतन भी देंगी। लेकिन सत्ता में आने के बाद केाई वादा पूरा नहीं होता। यह सिलसिला सालों से जारी है और हर बार कर्मचारी ही ठगा जाता है।

 अतं मैं इतना ही कहना चाहूंगा कि सार्वजनिक उपक्रम दिवस मनाते हैं तो लोक उपक्रम के उन सभी पदाधिकारी कर्मचारी एव कामगार के लिए भी मनन  एवं चिंन करना होगा जिन्होंने कि सार्वजनिक क्षेत्र के बिकास में उनका भी योगदान उतना ही है जो विलय के पश्चात विस्थापित कार्मिक है  या कार्यरत एवं समान वेतन भत्ते से वंचित है।देश के लाखों अस्थायी कर्मचारियों को राहत प्रदान करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में फैसला दिया है उन्हें भी निर्वहन हेतु समान कार्य समान वेतन के आधार २००७/२०१७ का वेतनमान दिये जाने पर लोक हित में बिचार करना चाहिए।

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