पत्रकारिता का एक छात्र मशाल खान (पाकिस्तान)  का मुल्लों ने बर्बरता से पीटते हुए किया क़त्‍ल 

अमित कुमार 

आप हिन्‍दुस्‍तान में रहते हों या पाकिस्‍तान में, अगर आप कार्ल मार्क्‍स और चे ग्‍वेरा को अपना रोल मॉडल मानते हैं और मजहबी पाखण्‍ड का पर्दाफ़ाश करते हुए अल्‍पसंख्‍यकों के ख़‍िलाफ़ हो रहे ज़ुल्‍मों-सितम के ख़‍िलाफ़ आवाज़ उठाते हैं तो आप मज़हब के सौदागरों को खटकने लगते हैं क्‍योंकि उन्‍हें यह डर सताने लगता है कि अगर आम लोग अक्‍़ल नाम की चीज़ का इस्‍तेमाल करके तर्क करना शुरू कर देंगे तो उनकी दुकान बंद होने में ज्‍़यादा समय नहीं लगेगा। 

पाक‍िस्‍तान के खै़बर पख़्तूनख्वा प्रान्‍त के मरदान शहर में पत्रकारिता का एक छात्र मशाल खान ऐसा ही एक शख्‍़स था। वह अपने कमरे में मार्क्‍स और चे के पोस्‍टर लगाता था, मज़हबी मान्‍यताओं पर सवाल उठाता था, पाकिस्‍तान में हिन्‍दुओं पर हो रहे ज़ुल्‍मों के ख़‍िलाफ़ आवाज़ उठाता था। जब धार्मिक कट्टरपंथी मुल्‍ले मशाल खान से बहस में नहीं टिक सके तो उन्‍होंने भीड़ इकट्ठी करके मशाल खान के हॉस्‍टल के कमरे में घुसकर उसे बर्बरता से पीटते हुए उसका क़त्‍ल कर दिया। इन मुल्‍लों का आरोप है कि मशाल ने तौहीने रिसालत (ईशनिंदा) की थी।  

लेकिन इन मुल्‍लों को नहीं पता कि मशाल खान के शरीर को ख़त्‍म करके वे उसके विचारों की मशाल को नहीं बुझा सकते हैं। पाकिस्‍तान में मशाल खान की मौत एक बड़ा मुद्दा बन गई है क्‍योंकि इस बर्बर घटना ने पाकिस्‍तान के संवेदनशील लोगों को स्‍तब्‍ध कर दिया है। 

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