​हर दिन नई कीमत

 यह नया प्रयोग है, जो काफी हद तक उलझाने वाला भी लगता है। एक मई से देश के पांच शहरों में पेट्रोल की कीमतों को निर्धारित करने का तरीका बदल जाएगा। जमशेदपुर, चंडीगढ़, विशाखापत्तनम, उदयपुर व पुडुचेरी में सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोल कंपनियां अब पेट्रोल की कीमत हर रोज निर्धारित करेंगी। यानी हर रोज बाजार भाव से आपको पेट्रोल की अलग कीमत चुकानी पड़ेगी। अभी तक ये पेट्रोल कंपनियां कीमत निर्धारित करने का काम महीने में दो बार- यानी पहली तारीख और 16 तारीख को करती हैं। यह एक पायलट परियोजना है, जो देश के अलग-अलग पांच कोनों में इसलिए शुरू की गई है कि उसके असर और उसे लागू करने की कठिनाइयों को अच्छी तरह समझा जा सके। पायलट परियोजना का अर्थ यह है कि जो इन पांच शहरों में शुरू हुआ है, वह जल्द ही पूरे देश में लागू होगा। वैसे सरकार ने पेट्रोल की कीमतों को जब से मुक्त बाजार के हवाले किया है, तब से यह लगभग तय ही था कि देर-सबेर हर रोज इसकी कीमत तय करने का वह फॉर्मूला जल्द ही भारत आएगा, जो दुनिया के बहुत से देशों में अपनाया जा रहा है। इसका फायदा सार्वजनिक क्षेत्र की पेट्रोल कंपनियों को तो मिलेगा ही, खुदरा बाजार में पेट्रोल बेचने वाली निजी क्षेत्र की कंपनियों को भी मिलेगा। अभी तक निजी क्षेत्र की इन कंपनियों के सामने मजबूरी यह रहती है कि वे सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का अनुसरण करती रहें।
जाहिर है, कीमत निर्धारण प्रक्रिया के दैनिक हो जाने से उन्हें स्पद्र्धा का मौका मिलेगा। हालांकि इसका कितना फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचेगा, यह अभी नहीं कहा जा सकता। सरकार ने 2010 में पेट्रोल की कीमत को नियंत्रण से मुक्त कर दिया था, इसके बाद 2014 में डीजल की कीमत को भी नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया। उसके बाद से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत लगातार गिर रही है, जिसका उपभोक्ताओं को बहुत ज्यादा फायदा मिलता नहीं दिखाई दिया।
एक बड़ा कारण सरकार की पेट्रोलियम नीति भी है। विश्व बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरने के साथ ही सरकार ने पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पादन शुल्क और अन्य कर काफी बढ़ा दिए हैं, जिससे इसकी कीमत बाजार में नीचे नहीं आ सकी है। इसके सरकार को सीधे-सीधे दो फायदे मिले हैं। एक तो विश्व बाजार में कीमतें काफी नीचे आ जाने से भारत को अब कच्चे तेल के आयात पर विदेशी मुद्रा काफी कम खर्च करनी पड़ रही है। कच्चा तेल भारत का सबसे बड़ा आयात है। दूसरे, कर बढ़ा देने से सरकार का राजस्व काफी ज्यादा बढ़ा है और उसके पास विभिन्न विकास परियोजनाओं को चलाने के लिए ज्यादा धन उपलब्ध है।

जरूरी नहीं है कि ये स्थितियां लंबे समय तक रहें। विश्व बाजार में कीमतें फिर बढ़ीं, तो सरकार के विकल्प सीमित हो जाएंगे। क्या तब वह कीमतों को बढ़ने से रोकने के लिए करों को कम करेगी? इसका सीधा अर्थ होगा राजस्व में कमी, यानी विकास परियोजनाओं के लिए कम धन उपलब्ध होना, जबकि घरेलू बाजार में पेट्रोलियम उत्पादों की कीमतें बढ़ने का अर्थ होगा महंगाई यानी मुद्रास्फीति का बढ़ना। तब यह पूछा जाएगा कि सरकार के पास अर्थव्यवस्था को विश्व बाजार की उथल-पुथल से बचाने की रणनीति क्या है? पेट्रोलियम उत्पादों पर सब्सिडी वाले युग में लौटना भी आसान नहीं होगा। सरकार तमाम सब्सिडी से पीछा छुड़ाने के लिए पहले ही हाथ-पैर मार रही है। अभी हो सकता है कि पेट्रोल और डीजल के दैनिक मूल्य निर्धारण की प्रक्रिया लोगों को अच्छी लगे, लेकिन एक बार अगर कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने लगीं, तो यह प्रक्रिया बुरी भी लग सकती है।
सौजन्य – हिन्दुस्तान।

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