​मनोनयन पर प्रश्न 

दुनिया के महान क्रिकेट खिलाड़ी रहे सचिन तेंदुलकर पर सवाल उठते हैं तो खामोश रहने के बजाय उन्हें जवाब देना चाहिए। राज्यसभा में मनोनीत सांसद की भूमिका निभा रहे सचिन का राजनीतिक करियर क्रिकेट की तरह चमकदार नहीं माना जा सकता। मनोनीत होने के बाद से अब तक 348 दिनों में से सचिन सिर्फ 23 दिन ही राज्यसभा पहुंचे। अन्य सांसदों की तुलना में सचिन का प्रदर्शन बेहद लचर है। संसद के प्रति सचिन की बेरुखी को लेकर सवाल पहले भी उठ चुके हैं। सरकार ने सचिन को राज्यसभा में मनोनीत किया तो उसके पीछे उनके अनुभव का लाभ उठाने की मंशा एकमात्र कारण रहा होगा।

इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि मैदान पर सचिन ने जो जलवा दिखाया वो सदियों तक याद रखा जाएगा। मैदान के बाहर सार्वजनिक जीवन में भी सचिन ने नैतिक मूल्यों का ध्यान रखा। शोहरत की बुलंदियों पर रहने के बावजूद सचिन कभी विवादों में नहीं पड़े। वरिष्ठ खिलाडिय़ों का सम्मान किया तो अपने से कम उम्र के खिलाडिय़ों को क्रिकेट का पाठ पढ़ाया। इन्हीं खूबियों के चलते उन्हें देश के सर्वोच्च सम्मान ‘भारत रत्न’ से नवाजा गया। ऐसे व्यक्तित्व पर सवाल उठते हैं तो उसका जवाब भी देश जानना चाहता है। राज्यसभा में मनोनयन का सीधा-सा अर्थ उस व्यक्ति को विशेष महत्व दिया जाना ही माना जाएगा।
बीते चंद सालों में संसद के कार्य दिवसों की संख्या लगातार घटती जा रही है। सचिन को राज्यसभा में मनोनीत हुए पांच साल पूरे हो चुके हैं और इन पांच सालों में अगर वे 23 दिन (यानी साल में पांच बार) ही संसद गए तो ये आश्चर्यजनक लगता है। सचिन के पास राज्यसभा में अभी एक साल का समय शेष है। सचिन ने जैसे मैदान पर अपने विरोधियों को अपने बल्ले से शान्त कराया था वैसे ही उन्हें संसद में अपनी वाणी से भी जवाब देना चाहिए।
सचिन का अनुभव देश के काम आए तो इससे बेहतर और क्या हो सकता है? वे देश के उन गिने-चुने व्यक्तियों में शुमार हैं जिनकी इज्जत पूरा देश करता है। किसी भी राजनीतिक दल या विचारधारा में आस्था रखने वाला व्यक्ति सचिन को पसंद करता है उनसे उम्मीद भी करता है कि देश की सबसे बड़ी ‘पंचायत’ में वे अपनी बात रखें। न सिर्फ बात रखें बल्कि समस्याओं के समाधान भी सुझाएं।

सौजन्य – पत्रिका।

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