​सहेला और सहेली 

पुरानी कहावत है- ‘मेरा यार बना थानेदार, तो फिर डर काहे का। यही खेल आजकल बड़े जोर-शोर से चल रहा है। आज सफलता इस बात पर निर्भर है कि आपकी कितने प्रभावशाली लोगों से ‘मित्रता’ है। माफ करना यहां उपयोग में लिए गए शब्द ‘मित्रता’ को परम्परागत दोस्ती से न जोड़े जहां मित्रता का अर्थ होता था निस्वार्थ प्रेम।
अगर आप किसी पहुंचवान के ‘सहेला’ हैं तो आपकी पांचों अंगुलियां घी में तर हैं और किस्मत से आप किसी ऊंचे पदधारी की ‘सहेली’ हैं तो फिर पांचों क्या बीसों घी-तेल-मक्खन में हैं और सिर कड़ाही में। ऐसी सहेलियों को ढूंढऩे में आपको ज्यादा मशक्कत नहीं करनी पड़ेगी। पहले तो समझे कि अपने देश में ‘पहुंचवान’ लोग कौन है? वे लोग जो किसी को आर्थिक लाभ और मलाईदार पद दिला सकते हैं।
इन महामानवों में हम मंत्रियों, नेताओं और अफसरों को स्थान दे सकते हैं। आपमें इनसे चिपकने की क्षमता है तो फिर मजे ही मजे हैं। इसके लिए आपको आत्मसम्मान, अस्मिता, आत्मगौरव शब्दों को अपने व्यक्तित्व से निकाल कर कमोड़ में बहाना होगा। क्योंकि आत्मसम्मान और चमचागिरी दोनों को एक साथ धारण नहीं कर सकते। ऐसा करेंगे तो आप उस उजबक की तरह नजर आएंगे जिसने धोती पहनकर गले में टाई लटका रखी हो। पहले राजकाज में योग्यता का बोलबाला था।
उच्च अधिकारी भी समझदार और समर्पित जनों की कद्र करते थे। जब वे स्वयं ही चापलूसी करके ऊपर उठे हैं तो उनसे योग्यता का सम्मान करने की अपेक्षा करना ऐसे ही है जैसे किसी गधे से राग मालकौंस गाने की उम्मीद करना। रही बात सहेलियों की तो भाइयों किसी वजीर या मंत्री की सहेली बड़ी खतरनाक होती है।
उससे बच कर रहने में ही भलाई है। उसके करतबों के बारे में तनिक भी बोल दिया तो कसम से पलट कर ऐसा वार करती है कि कहना पड़ेगा- दामन पे नहीं दाग, न ही हाथ में खंजर, तुम कत्ल करो हो कि करामात करो हो।

सौजन्य – पत्रिका.

Advertisements