​विचार की डोर

हर विचार अपने आप में एक दर्शन होता है, जो सोच, अध्ययन और अनुभवों से गुंथा होता है। समय-समय पर परिष्कृत भी होता रहता है। वह दर्शन चार्वाक जैसा भी हो सकता और महावीर-बुद्ध की तरह भी। यह जरूरी नहीं कि उससे सहमत हुआ ही जाए। विचार पर विवाद तब होता है, जब उसे आग्रह में तब्दील कर दिया जाता है। जाने-अनजाने उसे तलवार, गोला-बारूद और आतंक का विकल्प बना दिया जाता है।
क्लाडियन का मानना है कि ‘जो व्यक्ति दूसरे लोगों में आतंक पैदा करता है, वह दरअसल खुद लगातार भय से ग्रसित रहता है।’ इस भय से भी आग्रह पैदा होते हैं, जो हालात को भयावह बनाते हैं। ‘विचार’ कभी किसी पर हमला नहीं करता, सिर्फ बहस करता है। हमले की कोशिश हमेशा ‘आग्रह’ की तरफ से होती है। भगवान महावीर के शब्दों में, ‘विचार कभी आग्रहों से बंधा हुआ नहीं होता।’ जो अपने को चारदीवारी में बांध लेता है, वह कभी सत्य को उपलब्ध नहीं हो सकता।
विचार गतिशील रहे, तो सत्य बन जाता है। कुएं के मेढक की तरह इस किनारे से उस किनारे तक छलांग मारने को पूरी दुनिया को जीत लेने का दावा एक भ्रम है। यह या तो ज्ञान का अभाव है या अहंकार के प्रति निष्ठा। दोनों ही स्थितियों में जिज्ञासा मारी जाती है। जिज्ञासा हमेशा मन को विचारवान बनाती है और मनुष्यता के रास्ते पर ले जाती है। इस राह में आग्रह के लिए कोई जगह नहीं बचती है। अगर आग्रह हो, तो खुद को विचारवान बनाने का हो। बुद्ध ने कहा है, ‘आप जैसा सोचते हैं, वैसा ही बन जाते हैं’। यह हमारे विवेक पर निर्भर है कि विचार की डोर को किधर ले जाना चाहते हैं?
आचार्य रूपचंद्र
सौजन्य – हिन्दुस्तान।

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