​बेबस श्रोता 


व्यंग्य राही की कलम से
एक दिन राधे बोला-भाई, बचपन में नौटंकी देखी। किशोरावस्था में ख्याल सुने। जवानी में सिनेमा गए। मेले में खेल-तमाशे और छुट्टियों में सर्कस देख लिये। कविता कभी नहीं सुनी। कविता के नाम पर बस कॉलेज के सैकंड ईयर में सहपाठिन की ही याद है जिसका ब्याह परीक्षा पूर्व पढ़ाई छुड़वा कर करवा दिया था। तू तो काव्य गोष्ठियों में जाता रहता है एक दिन हमें भी ले चल। हमने हंस के कहा- राधे! कहां कविता और कहां तू।
कविकर्म करना ऐरे-गैरों के वश की बात नहीं। उससे भी बड़ी साधना है कविता सुनना। राधे खिसिया कर बोला- ठीक है भाई। हमारी समझ ज्यादा बड़ी नहीं है पर तुम लोग कविता तो आम आदमी के लिए ही लिखते हो ना? खैर, राधे को काव्य गोष्ठी में ले गए। दोपहर ढाई बजे का समय था लेकिन कविगण चार बजे तक इकठ्ठे हुए। जितने लोग थे सभी कवि थे सिवा राधे के, जो न जाने किस झोंक और शौक में आ गया था। संगोष्ठी से पहले गोष्ठी संयोजकजी ने एक हाहाकारी भाषण दिया। उनकी भाषा इतनी प्रांजल थी कि बेचारा राधे तो मुंह बाये देखता ही रहा।
प्रारम्भ के दो कवियों ने पहले दो छोटी कविता, फिर एक लम्बी कविता, फिर एक छोटी रचना और अंत में एक ताजा कविता जो उन्होंने भाषण के दौरान ही रची थी, सुनाई। इन दो कवियों ने ही आधा घंटा ले लिया। संयोजकजी ने तुरंत गणित लगाई कि अगर एक कवि ही पंद्रह मिनट लेने लगा तो चवालीस कवियों को निपटाते-निपटाते तो पूरे दस घंटे और लग जाएंगे सो उन्होंने तय किया कि सब तीन से चार मिनट ही कविता बांचेंगे।
मजे की बात यह कि जो कवि कविता सुना देता वह या तो चुपचाप या फिर जरूरी काम का हवाला देकर खिसक लेता। खैर पौने चार घंटे बाद गोष्ठी निपटी तो राधे लगभग मूर्छित हो गया था। रास्ते में बोला-भाई। भूलो बामण भेड़ खाई, अब खावै तो राम दुहाई। इसकी बजाय कहीं बैठ के कुछ पी ही लेते तो ठीक रहता। हमने स्कूटर चाय की दुकान पर रोक दिया।

(पत्रिका)

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