‘स्वच्छाग्रह “बापू को कार्यांजलि”- एक मिशन, प्रदर्शनी’ का उद्घाटन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 10 अप्रैल 2017 को चम्‍पारण सत्‍याग्रह की 100वीं वर्षगांठ के अवसर पर भारतीय राष्‍ट्रीय अभिलेखागार (एनएआई) जनपथ, नई दिल्‍ली में ‘स्वच्छाग्रह “बापू को कार्यांजलि”- एक मिशन, एक प्रदर्शनी’ का उद्घाटन किया। यह प्रदर्शनी देश के चम्‍पारण में सत्‍याग्रह के गांधीजी के पहले प्रयोग की 100वीं वर्षगांठ के अवसर पर उनको विनम्र श्रद्धांजलि है।

यह गांधीजी के ‘स्‍वच्‍छ भारत’ के सपने को पूरा करने के लिये आगामी पीढ़ी को संवेदनशील बनाने का भी प्रयास है, जहां देश के प्रत्‍येक नागरिक के विचार के साथ ही समाज का प्रतिबिंब भी स्‍वच्‍छ हो। यह डिजिटल और प्रयोगात्मक प्रदर्शनी, गांधी जी द्वारा विकसित सत्याग्रह के ‘जीवन चक्र’ के आवश्यक सिद्धांतों को स्वच्छाग्रह आंदोलन के तत्वों से जोड़ने का भी प्रयास है।

यह प्रदर्शनी एक महीने के लिये एनएआई परिसर में जनता के लिये खुली रहेगी और उसके बाद इसे मोबाइल प्रदर्शनी के रूप में देश के अन्य शहरों में ले जाया जाएगा। इस अवसर पर प्रधानमंत्री ‘ऑनलाइन इंटरएक्टि क्‍वीज’ का भी शुभारम्‍भ करेंगे, जो तीस महीने यानी अक्‍टूबर 2019 तक चलेगा।

इतिहास:

शुरूआत में गांधीजी चम्‍पारण नहीं जाना चाहते थे, बल्कि शायद उन्‍हें पता भी नहीं था कि चम्‍पारण कहां है और उन्‍हें नील की खेती करने वाले किसानों के हालात के बारे में भी कोई जानकारी नहीं थी। 10 अप्रैल, 1917 को पटना पहुंचने और 15 अप्रैल को मोतिहारी आगमन के तुरंत बाद उन्‍हें महसूस हो गया था कि वे यहां लम्‍बे समय तक ठहरेंगे। इस प्रदर्शनी में चम्‍पारण की घटना को सक्षिप्‍त में दर्शाया गया है।

अपने प्रवास के दौरान गांधीजी ने लोगों की समस्‍याओं को विस्‍तार से समझा था। उन्‍होंने पाया कि सिर पर मैला ढोने, निरक्षरता, महिलाओं और स्‍वास्‍थ्‍य से संबंधित मुद्दो जैसी सामाजिक कुप्रथाएं मुख्‍य रूप से प्रचलित थीं। गांधीजी के सामने आने वाले  राजनीतिक मुद्दों में ये समस्‍याएं आम थीं। इन दोनों मोर्चों पर बाधाओं से निपटने के लिए उन्‍होंने सत्‍याग्रह को हथियार के रूप में इस्‍तेमाल किया था।

चम्‍पारण सत्‍याग्रह ने भारतीय राजनीति की दिशा को ही बदल दिया और गांधीजी को देश के स्‍वाधीनता संग्राम के अग्रिणी के रूप में स्‍थापित कर दिया था। भारत के लोगों को पहली बार अहिंसा और बिना बल के प्रतिरोध की ताकत का एहसास हुआ था।

गांधीजी का स्‍वाधीनता संग्राम 15 अगस्‍त, 1947 को भारत की स्‍वाधीनता के साथ समाप्‍त हुआ। हालांकि राजनीतिक तौर से स्‍वाधीन भारत आज भी स्‍वास्‍थ्‍य, साफ-सफाई, स्‍वच्‍छ जल, स्‍वच्‍छता, जागरूकता और शिक्षा की कमी जैसी महत्‍वपूर्ण समस्‍याओं में जकड़ा हुआ है, जो गांधीजी के सामने चम्‍पारण में थीं।

चंपारण के इस ऐतिहासिक संघर्ष में डॉ राजेंद्र प्रसाद, डॉ अनुग्रह नारायण सिंह, आचार्य कृपलानी समेत चंपारण के किसानों ने अहम भूमिका निभाई थी।

इस प्रदर्शनी के जरिए गांधीजी के सत्‍याग्रह के मूल सिद्धांत को सत्‍याग्रह के जरिए स्थिति में सुधार के आंदोलन के रूप में समकालीन मुद्दों से जोड़ने का प्रयास किया गया है। देश की युवा पीढ़ी और वास्‍तव में हम सभी को इसके महत्‍व को समझने की आवश्‍यकता है।

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