​दुनिया को बदलने की प्रकिया में खुद को बदलो

अमित कुमार।

आचार्य रजनीश उर्फ़ ओशो ने लिखा है कि इस दुनिया को बदलने की जरुरत नहीं, बस खुद को बदल लो समझो दुनिया बदल गई। लगभग सभी धर्म ऐसे ही मतों से भरे पड़े हैं कि दुनिया बुरी नहीं है, बस दुनिया के बारे में हमारी धारणाए बुरी हैं। अगर हम दुनिया के बारे में अपनी धारणाए बदल लें तो दुनिया अपने आप बदल जाएगी। यह उपदेश उसी तरह है जैसे कोई कबूतर को यह सुझाव दे कि वो बिल्ली को देखकर अपनी आँखें बंद कर ले।
दूसरी तरफ इस धार्मिक मान्यता के उलटे सिरे पर ऐसे लोग भी हैं’ जिन्हें दर्शन की भाषा में यांत्रिक भौतिकवादी कहा जाता है। इनका कहना है कि जब दुनिया बदल जाएगी तो हम भी बदल जायेंगे; मतलब तब तक इसी दुनिया का आनंद लिया जाये। इसीलिए ये अपने व्यक्तिगत, पारिवारिक और सामाजिक जीवन में सामंती-पूंजीवादी मूल्यों-मान्यताओं, रस्मो-रिवाजों के खिलाफ लड़ने की कोई जरुरत नहीं समझते। भारत के कई कम्युनिस्ट ग्रुपों का व्यवहार इसी तरह है। ये अपने निजी जीवन में जाति-पाति, धार्मिक रीति-रिवाज, धार्मिक प्रतीकों, अरेन्ज्ड मैरिज जैसी परम्पराओं का खूब पालन करते हैं।

ये दोनों ही रुझान एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सिर्फ ऊपर से देखने पर ही इनमे फर्क नजर आता है। ये दोनों ही रुझान लूट और अन्याय पर टिकी इस पूंजीवादी व्यवस्था की उम्र लम्बी करने का ही काम करते हैं।

इन दोनों ही रुझानों का खंडन माओ ने बड़े ही खूबसूरत शब्दों में किया है : “दुनिया को बदलने की प्रकिया में खुद को बदलो|” यानी दुनिया को बदलते हुए उससे दूर रहकर आप खुद को नहीं बदल सकते और इस प्रक्रिया में खुद को बदले बिना आप दुनिया को भी नहीं बदल सकते …

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