एक नया प्रकार की विद्युत चालक ग्राफीन इलेक्ट्रिकल कंडक्टर की खोज

 

इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईएससी), बेंगलुरु के शोधकर्ताओं ने प्रयोगात्मक रूप से एक नए प्रकार के विद्युत चालक (कंडक्टर) का उत्पादन करने में सफलता हासिल की है, जिसकी सैद्धांतिक रूप से करीब 20 साल पहले भविष्यवाणी की गई थी।

भौतिक विज्ञान विभाग, आईआईएससी से अरिंदम घोष की अगुवाई वाली एक टीम ने सफलतापूर्वक एक ग्राफीन का उत्पादन किया है जोकि एक या कुछ परत मोटा है जिसकी वजह से यह एक किनारे तक विद्युत् प्रवाहित कर सकता है, इस किनारे को ज़िगज़ैग (वक्रीय) एज (किनारा) कहा गया है।

ग्राफीन परत की ज़िगज़ैग एज में एक विशेष गुण है: यह कमरे के तापमान और इसके ऊपर बिना किसी प्रतिरोध के विद्युत् के प्रवाह की अनुमति देता है।

प्रोफेसर घोष ने कहा, “यह पहला मौका है जब हमने ग्राफीन में सही एज को संरचना पाया और एज पर विद्युत प्रवाहकत्त्व दिखाया।” अध्ययन के परिणाम नेचर नेनो टेक्नोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित किए गए थे।

कुछ परतें-मोटी ग्राफीन जोकि एक किनारे पर ही विद्युत् का प्रवाह करती है उसे किसी भी प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ता है, और इससे कमरे के तापमान पर भी पॉवर-एफिसिएंट इलेक्ट्रॉनिक्स और क्वांटम सूचना हस्तांतरण भी साकार हो सकता है।

वर्ष 2004 में ग्राफीन के उद्भव होने के बाद से दुनिया भर के कई समूह इन एजेस तक पहुंचने का प्रयास कर रहे हैं, लेकिन इनमे से कई काफी हद तक असफल रहे हैं क्योंकि जब वर्तमान में ग्राफीन जब किसी माध्यम से बहती है, तो यह दोनों किनारों से तथा पूरे आयतन से बहती है।

ग्राफीन:

यह एक अणु की मुटाई वाली सामान्य कार्बन की एक पतली परत है जो विलक्षण गुण प्रदर्शित करती है। इसकी खोज आंद्रे जीम और कोंसटांटिन नोवोसेलोव ने की जिसके लिए उन्हें वर्ष 2010 का भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

गीम और नोवोसेलोव ने ग्राफीन को ग्रेफाइट के एक टुकड़े से निष्कर्षित किया है। ग्रेफाइट सामान्य पेंसिल में इस्तेमाल किया जाता है। ग्रेफाइट एक भङुर पदार्थ है। जिसे तोडने पर वह काच कि तरह टुट जाता है। और बिखर जाता है।

यह सबसे पतला पदार्थ है किंतु यह अब तक के पदार्थों में सबसे मजबूत भी है। बिजली का संवाहक होने के साथ साथ इसमें तांबे के भी गुण हैं। उष्मा का संवाहक होने के अलावा यह इस गुण में अन्य पदार्थों में सबसे आगे हैं। यह लगभग पारदर्शी है, इसके बावजूद यह इतना घना है कि सबसे छोटा गैस का अणु हीलियम भी इससे होकर गुजर नहीं सकता।

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