​सुलगते सवाल 

कानून की नजर में सब बराबर हैं। फिर चाहे वो 89 साल के लालकृष्ण आडवाणी हो या 85 साल के मुरली मनोहर जोशी। अयोध्या में विवादित ढांचा ढहाए जाने के मामले में सीबीआई ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष आडवाणी-जोशी समेत 21 नेताओं व कारसेवकों पर आपराधिक साजिश का मामला चलाने की बात कही है।
सुप्रीम कोर्ट ने 25 साल पुराने इस मामले को दो साल में निपटाने को कहा है। आजादी के बाद देश को बुरी तरह से झकझोरने वाला ये मामला 25 साल से अदालतों में अटका हुआ क्यों पड़ा है? आडवाणी-जोशी के वकील दलील दे रहे हैं कि एक लाख कारसेवकों के साथ साजिश कैसे की जा सकती है?

अदालतों को यही तो पता लगाना है कि ये साजिश किसने रची और क्यों? और यदि विवादित ढांचा ढहाए जाने के पीछे कोई साजिश नहीं थी तो अयोध्या में एक लाख कारसेवक एकत्र कैसे हो गए? तब तो न मोबाइल थे और न इंटरनेट। चंद घंटों में विवादित ढांचा ढहा दिया गया तो इसके पीछे सूत्रधार कौन थे?

आडवाणी 89 साल के हो गए या वे कोर्ट की सीढिय़ां कैसे चढ़ेंगे, इस तर्क के आधार पर किसी को राहत देने का कोई औचित्य समझ से परे है। ये देश धर्मनिरपेक्ष ढांचे की बुनियाद पर खड़ा है।

विवादित ढांचा अवैध था,तो क्या कोई भीड़ आकर उसे ढहा सकती है? हर विवादित निर्माण को भीड़ हटाने लगी तो फिर कानून क्या करेगा? अदालतें और पुलिस प्रशासन की जरूरत क्या रह जाएगी? जो गलती एक बार हो गई, वह फिर न दोहराई जाए, इसके लिए दोषियों को सजा मिलनी ही चाहिए। सुप्रीम कोर्ट की सटीक टिप्पणी के बाद मामले की रोजाना सुनवाई कर इसका त्वरित निपटारा हो ताकि ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ हो सके।

सौजन्य- पत्रिका।

Advertisements