आहार में बदलाव लाकर भी भारत में भूजल का उपयोग मे कमी ला सकते हैं -अध्ययन

आहार में मामूली बदलाव लाकर भारत में भूजल के उपयोग को काफी हद तक कम किया जा सकता है और इससे वर्ष 2050 तक 1.64 अरब लोगों को भोजन उपलब्ध कराने की समस्या का हल निकालने में देश को मदद मिल सकती है। एक नये अध्ययन में यह बात सामने आई है।

अध्ययन के अनुसार गेहूं और पोल्ट्री उत्पादों की खपत में कमी लाकर और सब्जियों, फलियों और तरबूज, नारंगी एवं पपीता जैसे फलों का सेवन बढ़ाकर भूजल का उपयोग कम किया जा सकता है क्योंकि इनके उत्पादन में कम जल की आवश्यकता होती है।

द लैनसेट प्लैनेटरी हेल्थ के पहले अंक में प्रकाशित इस अध्ययन में यह बताया गया है कि इस तरह आहार में बदलाव करने से ना सिर्फ भूजल का उपयोग कम करने में मदद मिल सकती है बल्कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में भी कमी लाई जा सकती है और इससे स्वास्थ्य पर सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

अध्ययन में कहा गया कि आहार में मामूली बदलाव लाने से भारत में भूजल के उपयोग को काफी हद तक कम किया जा सकता है और वर्ष 2050 तक 1.64 अरब लोगों का पेट भरने की समस्या से निपटने में देश को मदद मिल सकती है।

यह अध्ययन में कहा गया है कि आने वाले दशकों में भारत में कृषि क्षेत्र में फसलों की सिंचाई के लिए ताजा पानी की उपलब्धता में गिरावट आने की संभावना है जिससे खाद्य उत्पादन पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है।

इस अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने भारत में पांच विशिष्ट आहार पद्धतियों पर गौर किया और यह दर्शाया कि कैसे पोषण संबंधी मानकों को पूरा करते हुए और समग्र ऊर्जा खपत को बनाए रखते हुए भूजल के उपयोग को कम करने के लिए अनुकूलित किया जा सकता है। उन्होंने मानव स्वास्थ्य और ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में इन परिवर्तनों के प्रभाव का भी उदाहरण दिया है।

अध्ययन में कहा गया है कि, औसत आहार में प्रति दिन 51.5 ग्राम फलों का उपयोग और 17.5 ग्राम तक सब्जियों का उपयोग बढ़ाने के साथ ही 6.8 ग्राम पोल्ट्री पदार्थों की खपत में कमी करके ताजे पानी के उपयोग में 30 प्रतिशत की कमी तथा 13 प्रतिशत आहार ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में प्रतिशत में कमी लायी जा सकती है।

भूजल:

भूजल या भूगर्भिक जल धरती की सतह के नीचे चट्टानों के कणों के बीच के अंतरकाश या रन्ध्राकाश में मौजूद जल को कहते हैं। सामान्यतः जब धरातलीय जल से अंतर दिखाने के लिये इस शब्द का प्रयोग सतह से नीचे स्थित जल के रूप में होता है तो इसमें मृदा जल को भी शामिल कर लिया जाता है। हालाँकि, यह मृदा जल से अलग होता है जो केवल सतह से नीचे कुछ ही गहराई में मिट्टी में मौज़ूद जल को कहते हैं।

भूजल एक मीठे पानी के स्रोत के रूप में एक प्राकृतिक संसाधन है। मानव के लिये जल की प्राप्ति का एक प्रमुख स्रोत भूजल के अंतर्गत आने वाले जलभरे हैं जिनसे कुओं और नलकूपों द्वारा पानी निकाला जाता है।

जो भूजल पृथ्वी के अन्दर अत्यधिक गहराई तक रिसकर प्रविष्ट हो चुका है और मनुष्य द्वारा वर्तमान तकनीक का सहारा लेकर नहीं निकला जा सकता या आर्थिक रूप से उसमें उपयोगिता से ज्यादा खर्च आयेगा, वह जल संसाधन का भाग नहीं है। संसाधन केवल वहीं हैं जिनके दोहन की संभावना प्रबल और आर्थिक रूप से लाभकार हो। अत्यधिक गहराई में स्थित भूजल को जीवाश्म जल या फोसिल वाटर कहते हैं।

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