हमारे कलयुग के संत है ये कैसा दान कर रहे हैं ? 

प्रदीप गुप्त 

नाम संत के पांत मे – भारतीय जनमानस संतों को गुरु की उपाधि से मंडित करते रहे हैं और उनसे धर्म आध्यत्म,ग्रह् दोष पीड़ा निवारण जन्म मरण के ब्याधि से मुक्ति मार्ग पाते रहे, पर ये हमारे कलयुग के संत है ये कैसा दान कर रहे हैं? ये कैसी समाज सेवा कर रहे हैं?

ये तो अम्बानी की तरह खांटी अरबपति बनना चाह रहे है उद्योगों का साम्राज्य फैला रहे हैं,रोगों से निजात पाने के लिये पचास हजार रोजाना सेवा शुल्क वाले आरोग्य धाम खोल रहे हैं

अपने एक एक उत्पाद का विज्ञापन नित्य दूरदेर्शन पर परोस कर लोगों की आस्था को अपने मुनाफे में बदल रहे हैं

इनका एक उत्पाद है दन्त-कान्ति इसके भी अठारह् प्रकार-यानि येन केन प्रकारेण उपभोक्ता की जेब से पैसे झपटने की कितनी तीव्र उत्कंठा बलवती है इनके अंदर ये समझने की चीज है

इनके सामने डाबर,वैद्यनाथ,झंडू,साधना,खादी ग्रामोद्योग वाले बेईमान और ये सच्चे ईमानदार?

हमारे पुर्व के संतों ने मानव मात्र के उद्धार के लिए एक सूत्र दिया करते थे-प्रात भृमण, योग मन्त्र जप,रोग शमन के लिये किसी औषधि का नाम पर ये तो उपभोक्तावादी संत हैं ना, हर बिकने वाली चीज पर अपने नाम की मुहर लगा कर अमिताभ बच्चन हो रहे हैं,पुरा बाजार भक्तों को बेच रहें हैं तो पूंजीपति मालामाल हो रहे हैं तो जनता कंगाल

इनका फैलता उत्पाद साम्राज्य आम जनता के लिए कम पूंजीपति वर्ग के लिए ज्यादा है, भव्य शोरूम, मॉल इनके उत्पाद के खुल रहें हैं,छोटे छोटे परचून  पंसारी की दुकान ठप हो रही है कौन रोकेगा इन्हें-अस्वमेघी घोड़े पे सवार-चाटुकार चारणो की पांत इन्हीं के इर्द गिर्द मंडराती है

शिरडी वाले साई बाबा के भक्तों ने दक्षिण मे अस्पताल खोला है जहाँ रोगियों का मुफ्त इलाज होता है, और ये क्या कर रहीं हैं?

इसाई मशीनरी वालों ने सेवा के बदले धर्मान्तरण एवम इंग्लिश मीडियम पाठ्यक्रम को धंधा बनाया तो आपने पूरा धंधा ही अपना लिया-धन्य गुरु आपनो गईं गोविन्द दियो बताय-टका ही धर्म टका ही कर्म,यही तो आज का युगधर्म है, और फिर धर्म-आस्था श्रद्धा अफीम सी नशीली होती ही है जिसकी हद मे आपका धंधा खूब चल निकला।

धन्य हो प्रभु धन्य हो, काश ये सदबुधि स्वामी विवेकानंद को आ जाती तो ईस्ट इण्डिया कंपनी यहां पांव नहीं धर पाती। ओशो को आती तो कोलगेट जैसी कंपनियां यंहा टिक नहीं पाती…….

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