थोड़ा दुख,थोड़ा राम  (कविता)

लोग कैसे कैसे बहाने बनाने लगे है

मेरे दौर के लोग बेनकाब होने लगे हैं

कुछ हम ही थे नींद में गाफिल

मेरे जमाने के लोग कब के जगे हुए थे 

कुछ कम ही मिले साफगोई के मिसाल

मेरे जमाने के लोग जिम्मेवारियौ से कतराने लगे हैं

अब तरीके नए अख्तियार करने होगे 

मेरे दौर के प्यादे बादशाह कहलाने लगे हैं

                                                    प्रदीप गुप्ता

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