कुछ दरद कुछ आंसू (कविता)

इस अंंघेरे दिनों में उजाले की बाते किनसे करे।

चन्दा तारे सुरज जुगनु सब मावस के पुजारी निकले ।

हम अपने गरेबा में क्या झाकें?

इक खडंहर बदन है जो सांसें भर लेता है।

आगत की अगवानी को-दरद पुराना हार नई भूल आए हैं।

दुनिया के बाजार से हम सुख के बदले दुःरव मोल ले आए हैं।                                  

-दरद पुराना हार नई भूल आए हैं।

                                                           प्रदीप कुमार गुप्ता 

 

 

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