यह तो मानवीयता के विरुद्ध हमला है

सीरिया में विद्रोही गुटों के कब्जे वाले इदलिब प्रांत में 4 अप्रेल को रासायनिक बम से हमला किया गया। इसमें करीब 70 लोगों के मारे जाने की जानकारी मिली है। आश्चर्य की बात यह है कि यह हमला अपने ही देश में अपने ही नागरिकों पर किया गया। सीरिया में रासायनिक बम हमले की यह पहली घटना नहीं थी। इससे पूर्व भी गृह युद्ध में सरकारी सेनाएं व इस्लामिक स्टेट (आईएस) समर्थित विद्रोही गुट एक-दूसरे पर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करते रहे हैं।

संयुक्त राष्ट्र के संगठन ‘ऑर्गेनाइजेशन फॉर द प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपन के अनुसार पिछले एक साल में वहां सरकारी सेनाओं ने विद्रोहियों पर तीन से चार बार विभिन्न घातक गैसों का रासायनिक हथियारों के रूप में इस्तेमाल किया। संयुक्त राष्ट्र ने ताजा रासायनिक हमले की जांच प्रारंभ कर दी है। हालांकि पूर्व की तरह ही सरकारी सेनाओं ने इन हमलों में अपना हाथ होने से साफ तौर पर इनकार कर दिया। हम कैसे भुला सकते हैं कि इन हमलों में विद्रोहियों के साथ-साथ निर्दोष नागरिक व मासूम बच्चे भी अपनी जानें गंवाते रहे हैं। ये रासायनिक बमों से किए जाने वाले हमले न सिर्फ वहां के नागरिकों के लिए खतरनाक साबित होते रहे हैं बल्कि उस पूरे क्षेत्र के पर्यावरण और वनस्पति को भी बर्बाद कर देते हैं। ताजा हमलों में राष्ट्रपति समर्थक सैन्य बलों ने क्लोरीन गैस वाले बार्बेबिक बमों का हवाई हमलों में इस्तेमाल किया।

इस गैस के इस्तेमाल से प्रभावित व्यक्ति का दम घुटने लगता है व चिकित्सकीय मदद मिलने से पहले ही उसकी मौत हो जाती है। वहीं दूसरी ओर, विद्रोही गुट मस्टर्ड गैस का इस्तेमाल करते रहे हैं जिससे शरीर पर फफोले निकल आते हैं। इन हमलों में होने वाली मौतें बहुत ही तकलीफदेह होती हैं व जो बच जाते हैं उन्हें भी कई गंभीर बीमारियां जकड़ लेती हैं। लेकिन, सवाल यहां खड़ा होता है कि क्या विद्रोही गुट किसी खतरनाक रासायनिक बम का इस्तेमाल कर रहा है तो क्या सीरिया की सरकारी सेना को भी इसी तरह के हथियारों का इस्तेमाल करना चाहिए? मेरा मानना है कि रासायनिक हथियारों के इस्तेमाल को न्यूक्लियर हथियारों की श्रेणी में तो नहीं रखा जाता लेकिन इसके दीर्घकालीन घातक प्रभावों को देखते हुए इसका इस्तेमाल बिल्कुल नहीं होना चाहिए। यह दुश्मन पर हमला नहीं बल्कि मानवीयता पर हमला है।

ऐसा लगता है कि सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल असद का शासन व सरकारी सेना पर नियंत्रण नहीं रह गया है। वहां पूर्णत: अराजकता का माहौल है। आपको याद दिला दूं कि संयुक्त राष्ट्र ने मानवता के लिए दुष्परिणामों की भयावहता को देखते हुए रासायनिक हथियारों के निर्माण, इसके संग्रहण व उपयोग की रोकथाम के लिए 1968 में सदस्य देशों का सम्मेलन बुलाया। लेकिन, कई वर्षों की बहस के बाद 1997 में नीदरलैंड के हेग में संधि को अमलीजामा पहनाकर पूरे विश्व में लागू किया जा सका। इस संधि को रासायनिक हथियार रोकथाम संधि (सीडब्ल्यूसी) कहा जाता है। संधि को लागू कराने व इसकी निगरानी का जिम्मा ऑर्गेनाइजेशन फॉर द प्रोहिबिशन ऑफ केमिकल वेपन (ओपीसीडब्ल्यू) को दिया गया।

संधि के अनुसार ओपीसीडब्ल्यू की निगरानी में विभिन्न देशों के पास उपलब्ध रासायनिक हथियारों के जखीरे को न सिर्फ नष्ट करना था बल्कि नए देशों को रासायनिक हथियार बनाने से भी रोकना था। सीरियाई सरकार ने भी 2013 में सीडब्ल्यूसी संधि पर अधिकारिक रूप से हस्ताक्षर कर रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल न करने का वादा किया था। अक्टूबर 2016 तक विश्व के 93 प्रतिशत देशों ने यह घोषित कर दिया कि उन्होंने अपने रासायनिक हथियार पूर्णत: नष्ट कर दिए हैं। भारत ने भी 1997 में संधि पर दस्तखत किए।

इसके साथ ही हमने भी संधि की शर्त के मुताबिक अपने रासायनिक हथियार इस शर्त के साथ नष्ट कर दिए कि अगर उस पर कोई देश रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल करेगा तो अपनी रक्षा के लिए हम भी नाभिकीय हथियारों का उपयोग करने को स्वतंत्र होंगे। लेकिन, यह सारी बातें विरोधी को यह जताने के लिए होती हैं कि हम किसी भी स्थिति में कमजोर नहीं हैं। इन सारी बातों को मानसिक और कूटनीतिक दबाव के लिए इस्तेमाल किया जाता है लेकिन युद्ध की परिस्थिति में भी ऐसे हथियारों का इस्तेमाल नहीं किया जाता।

जहां तक सीरिया के हालात का सवाल है तो ऐसा लगता है कि वहां के अराजक माहौल मेें सरकार को मानवीयता की चिंता ही नहीं है। वह जैसे-तैसे विद्रोही गुटों को समाप्त कर सत्ता बरकरार रखने में जुटी है। युद्ध के दौरान भी अंतरराष्ट्रीय संधियों को मानना होता है, सरकार इसे शायद समझने की मन:स्थिति में भी नहीं है। जहां तक विद्रोही गुटों का सवाल है तो उनसे मानवीयता और संधि की उम्मीद करना ही बेमानी है। वहां दोनों पक्षों द्वारा रासायनिक हथियारों का इस्तेमाल रुके और निर्दोषों की जान बच सके, इसके लिए रूस और अमरीका जैसी महाशक्तियों को आपसी मतभेद भुलाकर काम करना होगा। अफसर करीम रक्षा विशेषज्ञ

सौजन्य – पत्रिका।

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