​आधी आबादी की उपेक्षा 

आधी आबादी यानी महिलाओं के राजनीतिक उत्थान की बातें करने वाले राजनीतिक दलों की करनी सामने है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के बाद इन राज्यों में बने मंत्रिमण्डल में महिलाओं की संख्या देखकर राजनीतिक दलों की मंशा का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। पांचों राज्यों में बीते दिनों 86 मंत्रियों ने शपथ ली जिनमें सिर्फ 9 महिलाओं को स्थान मिल पाया है। यानी ‘आधी आबादी को सिर्फ 10 फीसदी हिस्सेदारी मिली। राजनीति में महिलाओं को आगे लाने की बातें हर दल करता है लेकिन जब अवसर आता है तो उनको पर्याप्त भागीदारी देने का साहस कोई नहीं जुटा पाता। उत्तर प्रदेश में इस बार भाजपा की 32 महिला विधायक जीतकर आई हैं लेकिन मंत्रिमण्डल में सिर्फ 6 चेहरों को ही स्थान मिल पाया।
राजनीति में बराबर के दर्जे की बात तो दूर बीस फीसदी भागीदारी भी मिलना मुश्किल है। संसद-विधानसभाओं में महिला आरक्षण का मुद्दा सालों से अटका पड़ा है लेकिन बात है कि आगे बढऩे का नाम ही नहीं ले रही। केंद्र में 10 साल कांग्रेस की सरकार रहकर चली गई और अब लगभग तीन साल से भाजपा सरकार चला रही है लेकिन महिला आरक्षण की तरफ ध्यान देने वाला कोई नहीं। इस मामले पर हर राजनीतिक दल एक ही दिशा में चलता नजर आ रहा है। विचारणीय सवाल ये कि उन दलों में भी महिलाओं को पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिल पा रहा, जिनकी कमान महिलाओं के हाथों में है। कांग्रेस, बसपा, अन्नाद्रमुक और तृणमूल कांग्रेस का नेतृत्व महिलाएं कर रही हैं लेकिन वहां भी हाल लगभग दूसरे दलों जैसा ही है।

महिलाओं को पर्याप्त मौका नहीं मिल पाने की बात चलती है तो तर्क दिए जाते हैं कि हर दल जिताऊ उम्मीदवार पर ही दांव खेलना चाहता है। तर्क से सहमत हुआ जा सकता है। लेकिन जब महिलाएं जीतकर संसद-विधानसभाओं में पहुंचती हैं तो उन्हें मंत्रिमण्डल में पर्याप्त प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिया जाता? इसका जवाब शायद किसी के पास नहीं। महिलाओं में राजनीतिक जागरूकता बढ़ रही है लेकिन अब भी उन्हें वो हक नहीं मिल पा रहा, जिसकी वे हकदार हैं। महिलाएं राजनीति में सशक्त होंगी तो इसका नतीजा सभी क्षेत्रों में दिखाई देगा।

सौजन्य- पत्रिका।

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