​एनटीपीसी टंडवा V/S सीसीएल  आम्रपाली कोल परियोजना.


एक सवाल ?  कौन किससे विस्थापित और कौन किससे प्रभावित।



टंडवा शहीद चौक में प्रदुषण के कारण, महिलाओं द्वारा लगातार हो रहे विरोध पर सीसीएल आम्रपाली के प्रोजेक्ट ऑफिसर के.के सिन्हा ने तोड़ी अपनी चुप्पी।
आम्रपाली पीओ ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि टंडवा शहीद चौक की दुरी आम्रपाली कोल माइन्स वर्किंग एरिया से बहुत ज्यादा है उसके बावजूद ग्रामीणों की मांग पर हमने 12000 लीटर का टेंकर सिर्फ उरसू से शहीद चौक और एनटीपीसी बायपास रोड पटाने का कॉन्ट्रैक्ट वही के ठिकेदार को दिया है और बिल रिपोर्ट के अनुसार पानी भी नियमित रूप से पटाया जा रहा है। …….लेकिन एनटीपीसी का कार्य कर रहे भेल कंपनी का भारी लदे वाहनों के लगातार आवागमन से रोड में तुरंत धूल उड़ने लगता है।
आम्रपाली पीओ ने ये भी बताया कि शहीद चौक पर सीसीएल द्वारा सोलर रोड लाइट की भी व्यवस्था की गयी है।
शहीद चौक में सुरक्षा दृष्टि को देखते हुए सीसी टीवी कैमरा भी सीसीएल के सौजन्य से लगाया गया है जिसका कमांड टंडवा थाना को दिया गया है।
सामाजिक कार्य और बेरोजगारी पर आम्रपाली पीओ ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से टंडवा, गाडिलांग, कमता, के बेरोजगार युवको को उनके योग्यता अनुसार आम्रपाली कोल परियोजना में कॉन्ट्रैक्ट नौकरी भी दिया गया।
उन्होंने ये भी बताया कि राहम, टंडवा कमता, गाडिलांग के कई नए ठीकेदारों को भी आम्रपाली कोल माइन्स में ठीकेदारी का कार्य करने का मौका मिला।
आम्रपाली पीओ ने बताया कि जमीन का क्लीयरेंस नहीं होने के कारण कोल ट्रांसपोर्टिंग गाड़ियों का आवागमन फिलहाल शहीद चौक से हो रहा है। और जल्द इसका भी बिकल्प मिल जाएगा।
वहीँ दूसरी तरफ उरसू निवासी ग्रामीण भी एनटीपीसी के खिलाफ आंदोलन की रुपरेखा बनाते नजर आ रहे है। …ग्रामीणों का कहना है कि एनटीपीसी में हमारा जमीन भी गया है और भेल कंपनी का भाड़ी मात्रा में सामान से लदे गाड़ियों का परिचालन और चुंदुरु मंदिर से गरुवा पुल तक गाड़ियों का सड़क में खड़े रहने से आवागमन में दिक्कत तो होता ही है और धूल भी बहुत उड़ता है। भारी लोहे के सामान से लदी गाड़ियों ने सड़क को खेत में बदल दिया है।  लेकिन इसके बावजूद उद्सु, कुमरांग निवासी ग्रामीणों को न तो एनटीपीसी से बिस्तापित और न प्रभावित होने का हक़ मिला है।
बहरहाल बात सीसीएल की हो या एनटीपीसी की अभी तक दोनों परियोजना ने बिस्तापित और प्रभावित अधिकार क्षेत्र को सही से स्वीकारा ही नहीं है शायद यही बजह है कि कुछ दिमाग वाले लोग खुद को बिस्तापित और प्रभावित बता कर परियोजना से अपना उल्लू सीधा करने में लगे है। यहाँ तक कि जिनका औद्योगिक क्षेत्र में 1 डिसमिल जमीन भी नहीं है वे माननीय नेता और बन्दुक के दम पर गरीब बिस्तापित और प्रभावित ग्रामीणों के हक़ की रोटी को बन्दर बाट करने में लगे दिखाई दे रहे है। 
इतना ही इन सब से जो बचता है उसे शहर विकास, महोत्सव आयोजन और स्कूल कालेज भवन निर्माण के नाम पर दूसरे जिलों में सांसद और राज्य सरकार के आदेश पर परियोजना अधिकारी उनको दे देते हैं। 
ऐसे में एनटीपीसी और आम्रपाली से बिस्तापित एवं प्रभावित ग्रामीणों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे अपने इस हाल का जिम्मेवार किसको ठहराये सीसीएल या एनटीपीसी को ?

डवा शहीद चौक में प्रदुषण के कारण, महिलाओं द्वारा लगातार हो रहे विरोध पर सीसीएल आम्रपाली के प्रोजेक्ट ऑफिसर के.के सिन्हा ने तोड़ी अपनी चुप्पी।

आम्रपाली पीओ ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि टंडवा शहीद चौक की दुरी आम्रपाली कोल माइन्स वर्किंग एरिया से बहुत ज्यादा है उसके बावजूद ग्रामीणों की मांग पर हमने 12000 लीटर का टेंकर सिर्फ उरसू से शहीद चौक और एनटीपीसी बायपास रोड पटाने का कॉन्ट्रैक्ट वही के ठिकेदार को दिया है और बिल रिपोर्ट के अनुसार पानी भी नियमित रूप से पटाया जा रहा है। …लेकिन एनटीपीसी का कार्य कर रहे भेल कंपनी का भारी लदे वाहनों के लगातार आवागमन से रोड में तुरंत धूल उड़ने लगता है।
आम्रपाली पीओ ने ये भी बताया कि शहीद चौक पर सीसीएल द्वारा सोलर रोड लाइट की भी व्यवस्था की गयी है।
शहीद चौक में सुरक्षा दृष्टि को देखते हुए सीसी टीवी कैमरा भी सीसीएल के सौजन्य से लगाया गया है जिसका कमांड टंडवा थाना को दिया गया है।
सामाजिक कार्य और बेरोजगारी पर आम्रपाली पीओ ने बताया कि पिछले तीन वर्षों से टंडवा, गाडिलांग, कमता, के बेरोजगार युवको को उनके योग्यता अनुसार आम्रपाली कोल परियोजना में कॉन्ट्रैक्ट नौकरी भी दिया गया।
उन्होंने ये भी बताया कि राहम, टंडवा कमता, गाडिलांग के कई नए ठीकेदारों को भी आम्रपाली कोल माइन्स में ठीकेदारी का कार्य करने का मौका मिला।
आम्रपाली पीओ ने बताया कि जमीन का क्लीयरेंस नहीं होने के कारण कोल ट्रांसपोर्टिंग गाड़ियों का आवागमन फिलहाल शहीद चौक से हो रहा है। और जल्द इसका भी बिकल्प मिल जाएगा।
वहीँ दूसरी तरफ उरसू निवासी ग्रामीण भी एनटीपीसी के खिलाफ आंदोलन की रुपरेखा बनाते नजर आ रहे है। …ग्रामीणों का कहना है कि एनटीपीसी में हमारा जमीन भी गया है और भेल कंपनी का भाड़ी मात्रा में सामान से लदे गाड़ियों का परिचालन और चुंदुरु मंदिर से गरुवा पुल तक गाड़ियों का सड़क में खड़े रहने से आवागमन में दिक्कत तो होता ही है और धूल भी बहुत उड़ता है। भारी लोहे के सामान से लदी गाड़ियों ने सड़क को खेत में बदल दिया है।  लेकिन इसके बावजूद उद्सु, कुमरांग निवासी ग्रामीणों को न तो एनटीपीसी से बिस्तापित और न प्रभावित होने का हक़ मिला है।
बहरहाल बात सीसीएल की हो या एनटीपीसी की अभी तक दोनों परियोजना ने बिस्तापित और प्रभावित अधिकार क्षेत्र को सही से स्वीकारा ही नहीं है शायद यही बजह है कि कुछ दिमाग वाले लोग खुद को बिस्तापित और प्रभावित बता कर परियोजना से अपना उल्लू सीधा करने में लगे है। यहाँ तक कि जिनका औद्योगिक क्षेत्र में 1 डिसमिल जमीन भी नहीं है वे माननीय नेता और बन्दुक के दम पर गरीब बिस्तापित और प्रभावित ग्रामीणों के हक़ की रोटी को बन्दर बाट करने में लगे दिखाई दे रहे है। 
इतना ही इन सब से जो बचता है उसे शहर विकास, महोत्सव आयोजन और स्कूल कालेज भवन निर्माण के नाम पर दूसरे जिलों में सांसद और राज्य सरकार के आदेश पर परियोजना अधिकारी उनको दे देते हैं। 
ऐसे में एनटीपीसी और आम्रपाली से बिस्तापित एवं प्रभावित ग्रामीणों को सोचने पर मजबूर कर दिया है कि वे अपने इस हाल का जिम्मेवार किसको ठहराये सीसीएल या एनटीपीसी को ?

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