नसीहतों का पिटारा

व्यंग्य राही की कलम से

ऐसा नहीं कि हम नसीहत दे नहीं सकते या देना नहीं चाहते या नसीहत देने की कोशिश नहीं करते। एक विशुद्ध हिन्दुस्तानी होने के कारण दिन में चार-पांच बार हमारे हिवड़े में किसी को ज्ञान पिलाने की ‘फडफ़ड़ी’ उठती है। पर लाचार हैं। चन्द्रमुखी- मृगलोचनी हमारे उड़े हुए केशों को देख अंकल कहने लगी हैं और आजकल के लड़कों के पास नसीहत सुनने का टैम ही नहीं है। बावजूद इसके एक बेशर्म बुड्ढे की तरह जब भी मौका मिलता है, हम नसीहतों का पिटारा खोल लेते हैं।

उस फेरीवाले की तरह जो बीच मोहल्ले अपनी गांठ खोल लेता है बगैर चिन्ता किए कि उसकी खेस या चादर कोई खरीदेगा या नहीं। बहरहाल आज की नसीहत है- भीड़ से बच बेटा। भीड़ का अपना मनोविज्ञान है। आपको पता है यह साम्प्रदायिक दंगे क्यों होते हैं? अचानक इंसान एक भीड़ में बदल जाते हैं। दंगों का इतिहास उठा लीजिए। जो कुछ किया वह ‘भीड़’ ने किया। भीड़ में घुसा आदमी सोचता है कि वह कुछ भी करने को स्वतंत्र है।

उसे देख कौन रहा है। भीड़ को हंसाना और रुलाना बड़ा आसान है। अकेले को अच्छे से अच्छा चुटकुला सुना दो, जरूरी नहीं कि वह हंसे, लेकिन भीड़ को एक निहायत सड़ा हुआ बेमजा चुटकुला सुनाओ, अगर एक ‘मूर्ख’ भी हंस पड़ा तो सारी भीड़ ‘ठहाके’ मारने लगेगी। हाल ही यूपी के चुनावी नतीजे देखकर जीतने वाले उसी तरह हैरत में पड़ गए जैसे 1984 में जीतने वाले पड़े थे। भीड़ जब किसी के साथ होती है तो निहाल कर देती है।

भीड़ जब चलती है तो उसे चिंता नहीं रहती कि वह अपने कदमों तले कितनों को रौंद रही है। कभी-कभी तो हमारा हिया फटने लगता है कि कहीं हमारा ‘लोकतंत्र ‘भीड़तंत्र’ तो नहीं हो रहा। भीड़ की ‘चिखोपुकार’ से ही तानाशाह पनपते हैं। साहबजी। गुस्सा न होइए। यह हम नहीं ससुरा इतिहास कहता है। वैसे भी आप आजकल इतिहास बदलने पर तुले हुए हैं।

सौजन्य- पत्रिका।

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