एक बार फिर उड़ा लोकतंत्र का मजाक

गोवा और मणिपुर में जैसे-तैसे भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बन गईं। अल्पमत के बावजूद इस पार्टी के नेताओं ने दोनों ही राज्यों में सरकार बनाने का दावा किया जिसे दोनों ही राज्यों के राज्यपालों ने स्वीकार किया। प्रश्न यह है कि राज्यपालों ने ऐसा करके संविधान के मुताबिक काम किया या वे केंद्र सरकार के दबाव में रहे?                                                                  कहते हैं जैसे-जैसे प्रजातंत्र की उम्र बढ़ती है उसकी मजबूती में भी इजाफा होता है। संसदीय प्रजातन्त्र के जन्मस्थान ब्रिटेन में पिछले 400 साल में काफी गलतियां होती रहीं पर समय के साथ वह परिपक्व भी होता गया। भारत में भी सात दशक से हमने इसका अभ्यास किया परन्तु परिणाम ठीक उलट दीख रहे हैं। आजादी के पहले पांच दशक तक तो समर्थ और दबंग, कमजोर तबकों को वोट नहीं डालने देते थे। इसै रोकने और जल्द चुनाव की मंशा से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) से वोट डाले जाने लगे लेकिन अब इसी मशीन पर शक होने लगा है। पांच राज्यों के चुनाव के बाद राज्यपाल नाम की संस्था पर एक बार फिर प्रश्न चिन्ह लग गया है। जिस तरह गोवा और मणिपुर में राज्यपालों ने संविधान, अपनी शपथ, सर्वोच्च न्यायालय के फैसले, व्यक्तिगत शुचिता और लोक-मर्यादा को ठेंगा दिखा केंद्र सरकार के इशारे पर फैैसले किये, इससे भारतीय प्रजातंत्र के इस नए अवतार पर चिंता होने लगी है। अगर यही ‘जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा का नमूना है तो राजतन्त्र या गुलाम परम्परा में क्या बुराई थी?                                                   उम्मीद थी कि व्यक्तिगत स्वार्थ (पद पर बने रहने की) अगर भारी पडें तो अन्य संस्थाएं उन्हें रोक देंगी पर शायद हम भूल गए कि नैतिकता के प्रश्न कानून बनाने से हल नहीं हो सकते। सरकारिया आयोग और जस्टिस एम.एम. पंछी आयोग ने और बाद में सर्वोच्च न्यायालय के तमाम फैसलों ने और अंत में सर्वोच्च न्यायालय की नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने बोम्मई फैसले में स्पष्टरूप से बताया कि चुनाव होने के बाद ऐसी स्थितियों में राज्यपाल को किस तरह से फैसले लेने होंगे।       लेकिन, पिछले छह दिनों में जिस तरह दोनों राज्यों के राज्यपालों ने इन्हें ठेंगा दिखाया, वह एक बेहतरीन उदाहरण है प्रजातंत्र में लोक-मर्यादाओं के क्षरण का। बोम्मई फैसले में जो उपरोक्त आयोगों की सिफारिशों को ही यथावत् अंगीकार करता है, में कहा गया था कि किस क्रम में राज्यपाल राजनीतिक दलों को सरकार बनाने के लिए बुलाएंगे। इसके अनुसार सबसे पहले उस दल को या दल-समूह को बुलाया जाएगा जिस का स्पष्ट बहुमत है।                                                                       अगर ऐसा नहीं है तो सबसे पहले जो दल सबसे ज्यादा सीटें जीता है वह आहूत किया जाएगा। अगर वह मना करता है तो उस दल समूह को जो चुनावोपरांत एक साथ आते है उन्हें बुलाएंगे। इसका अर्थ यह है कि दोनों राज्यों में पहले उस दल को बुलाया जाना चाहिए था जिसके पास सबसे ज्यादा विधायक थे यानी कांग्रेस को बुलाया जाता लेकिन राज्यपालों ने सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ की अवहेलना की। सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला भी पूरी तरह से अपनी ही अदालत के 9-सदस्यीय पीठ के फैसले को नजरदाज करता है।                                           जाने-माने संविधान विशेषज्ञ फली नरीमन तो इस फैसले से इतने आहत हुए कि उन्होंने कहा कि सर्वोच्च न्यायालय अपनी ही बड़ी अदालत के फैसले का संज्ञान लेना भूल गई।चुनाव परिणाम के बाद राज्यपाल से अपेक्षा होती है कि वे सभी दलों से बात करेंगे और स्थिति जानने के सार्थक प्रयास करेंगे ताकि एक सम्यक निर्णय लिया जा सके। यह कोई ओलंपिक की 100 मीटर रेस नहीं होती जिसमें जो पहले दावा लेकर राजभवन पहुंचा वह जीता।                                                                       दरअसल संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रपति और राज्यपाल के लिए संविधान में शपथ की अलग व्यवस्था रखी है जिसके तहत ये दोनों संविधान के ‘संरक्षण, अभिरक्षण और परिरक्षण’ की शपथ लेते हैं जबकि अन्य सभी (चाहे वह प्रधानमंत्री हों या भारत के मुख्य-न्यायाधीश) संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं। ऐसे में 9-सदस्यीय पीठ जिसमें कानून की ताकत होती है, की बात न मानना उस शपथ की अवहेलना है क्योंकि इसमें संविधान संरक्षण नहीं हो पाया है। तो, क्यों राज्यपाल केंद्र के एजेंट के रूप में काम करते रहे हैं। राज्यपालों ने जिस तरह से कार्य किये, जनता का प्रजातंत्र पर विश्वास डगमगाने लगा है। दरअसल इसमें दोष संविधान निर्माताओं का है जिन्होंने इस संस्था को केंद्र का खिलौना बना दिया।                                                       संविधान के प्रावधानों को देखने से लगता है कि अगर किसी एक संस्था के साथ बड़ा मजाक किया गया है तो वह राज्यपाल की संस्था है। गौर कीजिये, इन संवैधानिक विरोधभासों का। राज्यपाल की शपथ संविधान के संरक्षण की होती है लेकिन इसका पद पर बना रहना केंद्र की इच्छा पर है। राज्यपाल कहां से वह नैतिक साहस लाएंगे कि वे बगैर केंद्र की इच्छा की चिंता किये सत्य पर तन कर खड़े रहें। संविधान के अनुसार राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत यानी केंद्र की इच्छा होने पर ही पद पर रहेंगे। क्या इतनी कमज़ोर संस्था से संविधान के संरक्षण, अभिरक्षण व परिरक्षण की उम्मीद की जा सकती है?         दरअसल, या तो राज्यपालों वही संवैधानिक संरक्षण मिले जो राष्ट्रपति को मिलता है या फिर गोवा और मणिपुर जैसी स्थितियों में राज्यपाल के लिए कानूनी बाध्यता हो कि वह ‘कंपोजिट फ्लोर टेस्ट’ के सिद्धांत का सहारा ले। इसके तहत विधानसभा को ही कहा जाए कि वह अपने नेता यानी मुख्यमंत्री को स्वयं चुने। किसी दल को निमंत्रित करने पर उस दल को लाभ मिलता है जिसका नेता मुख्यमंत्री बनना चाहता है। वह पद व पैसे का लालच देकर विधायकों की खरीद कर सकता है।

साभार (पत्रिका)

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