हार्वर्ड, आईआईटी, आईआईएम : ब्रैंड का जुनून ही समस्या

प्रधानमंत्री ने हाल ही में उत्तर प्रदेश में एलीट संस्थानों के विशेषज्ञों द्वारा रखे सिद्धांतों और मतों पर भरोसा करने की समस्या के बारे में टिप्पणी की थी। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग बहस जीतने के लिए तथ्य नहीं रखते बल्कि ब्रैंडेड संस्थानों से हासिल डिग्रियां सामने रख देते हैं। प्रधानमंत्री सही थे लेकिन, एक राष्ट्र के रूप में हमें भी आईआईटी, आईआईएम या अन्य विदेशी ब्रैंडेड संस्थानों के प्रति जुनून के बारे में आत्म-परीक्षण करना चाहिए। क्यों हम हार्ड वर्क की बजाय हार्वर्ड को तरजीह देते हैं?

स्कूल में रहते ज्यादातर बच्चे अच्छे इंजीनियर बनने का सपना नहीं देखते बल्कि आईआईटी में जाने और गूगल या एपल के लिए काम करने का सपना देखते हैं। वर-वधू की तलाश में भी अच्छे मूल्यों और नैतिक मानदंडों की बजाय अमेरिका में जॉब, प्रतिष्ठित संस्थान से शिक्षा और गोरे रंग जैसी चीजों पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है। इसके कई सामाजिक दुष्प्रभाव हैंं।

क्रिसिल की रिपोर्ट बताती है कि देश में कोचिंग इंडस्ट्री 75,000 करोड़ रुपए से ज्यादा की हो गई है। छात्र रचनात्मक एक्सरसाइज में मशगुल होने की बजाय ब्रैंडेड संस्थानों में प्रवेश के लिए कोचिंग सेंटर पर घंटों बिताते हैं। यह इंडस्ट्री स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को और धक्का पहुंचाती है। अपने नाम के साथ विदेशी ब्रैंड के उल्लेख की लालसा कई प्रतिभाशाली छात्रों को विदेश जाने के लिए प्रेरित करती है। फिर चाहे सुंदर पिचई (गूगल), सत्या नडेला (माइक्रोसॉफ्ट) या इंदिरा नूयी (पेप्सी) ही क्यों न हो। यदि ये लोग भारत में होते तो कल्पना करें कि देश के विकास में कैसा योगदान देते।

इंजीनियर, डॉक्टर, मैनेजर और आईएएस अफसरों के प्रति हमारे विशेष सम्मान के कारण अन्य पेशों को सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं नहीं मिलतीं। भिन्न रुचि होने के बावजूद छात्र ऊंची ब्रैंड वैल्यू वाले पेशे में जाने को मजबूर हो जाते हैं। अन्य पेशों में प्रतिभा का अकाल तो होता ही है, वे भी अपने मौजूदा पेश से संतुष्ट नहीं होते। अगली बार हम किसी के रहने की जगह या शैक्षिक संस्थान के आधार पर आकलन करें तो यह याद रखें कि सफल लोग ही अच्छे ब्रैंड बनाते हैं, अच्छे ब्रैंड सफल लोग नहीं बनाते।
दिवाकर झुरानी

सौजन्य- दैनिक भास्कर

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